पर हर पल सबकी ख़्वाहिशे होती पूरी नहीं।
प्यार ज़िन्दगी में हर कोई करता तो है।
पर प्यार सबको मिल जाए ये ज़रुरी नहीं....
--दिलीप--

किसी को मिला है इतना की उसे लुटाने का बहाना नहीं है।
और कोई इतना है मजबूर की उसे पेट भर खाना नहीं है।
किसी के आंखों से हर पल बहता है खारा पानी।
कोई एसा भी है जिसकी हंसी का ठिकाना नहीं है।
लोग क्यों तुम्हें(डॉक्टर) खुदा का दूसरा रुप कहते हैं।
जब इक मरते हुए इंसा को तुम्हें बचाना नहीं है।
क्यों तुम कई(सरकार) योजनाएं बनाते हो लोगों के लिये।
जब जरुरत मंदों तक उन्हें तुम्हें पहुंचाना नहीं है।
लोग क्यों एक गरीब को देखते है दूसरी नज़रों से।
जब अपने हिस्से की एक रोटी उन्हें खिलाना नहीं है।
कड़ाके की ठंड है और वो जनता का हितैषी बनते है।
जरा देख कैसे रहते है वो जिनका कोई आशियाना नहीं है।
हर साल इस भूख से मरते है न जाने कितने लोग।
ये कलंक है हमपर, पर हमें इसे मिटाना नहीं है।
खुदा भी बसता है बस अमीरों के घरों में।
इन गरीबों का तो यहां कोई ठिकाना नहीं है...
---दिलीप---

किसी की किस्मत में हैं उजाले भरे दिन।
किसी की किस्मत में अंधरे भरी रात है।
किसी की हथेलियां हैं बरसों से खाली।
किसी के हाथों में अपनों का हाथ है।
कोई चाहकर भी नहीं मिल पाता अपनों से।
कोई हर रोज करता अपनों से मुलाकात है।
किसी को नहीं मिलती एक पल की भी खुशी।
किसी को मिलता हर पल हसी सौगात है।
कोई ये नहीं जानता कि ये रोना क्या है।
किसी के आंखों से होती अंसूओं की बरसात है।
क्यों किसी के हिस्से में है गम किसी के खुशी।
जबकी सुना है खुदा रहता सबके साथ है।
---दिलीप--
आंखों में उनकी सूरत दिल में उनका फसाना है।
ये मेरा नादान दिल बस उन्हीं का दिवाना है।
क्या हुआ जो अभी वो दूर रहा करती हैं मुझसे
एक दिन उन्हें वापस मेरे ही पास आना है।
हर पल इस दिल की बस यही है तमन्ना।
कभी न कभी उन्हें अपना बनाना है।
डर लगता है उन्हें कोई छीन न ले मुझसे
उनकी सूरत को अपनी आंखों में छुपाना है।
मेरे अपने कहते है ए नई नई दिल्लगी है।
क्या जाने वो की ए रोग बहुत पुराना है।
प्यार करने वालों को क्यों मिलती है मौत।
क्यों होता इतना बेदर्द ए जवाना है।
क्यों लोगों ने बनाई है अमीरी गरीबी की दिवार।
सब जानते है इक दिन सबका एक ही ठिकाना है
लोग कहते हैं मेरे चेहरे पर वो हसी न रही।
आज मुझे भी दिल खोलकर मुस्कुराना है।
खुदा तेरा उम्र भर एहसान रहेगा मुझपर।
तुने मुझे जो दिया इतना हसी नज़राना है।
--दिलीप--
कुछ रिश्तों को खोया कुछ रिश्तों को पा गया।
ज़िन्दगी की दौड़ में न जाने मैं कहां आ गया।
कभी-कभी इस चकाचौंध से सहम सा जाता हूं।
जब हज़ारों की भीड़ में खुद को तन्हा पाता हूं।
हमारे लिए तो वो बचपन का दिन ही प्यारा था।
टूटा- फूटा ही सही पर वो घर तो हमारा था।
जब देखता हूं मुड़कर आंखे भर जाती हैं।
घर के आंगन में बैठी मां नज़र आती है।
जी करता है मां कहकर गले से लिपट जाऊ।
बिना उनके दिल नहीं लगता है उनकों ये बताऊ।
आंखे खुलते मां का चेहरा धूंघला नज़र आता है।
फिर वहीं अकेले पन का डर मुझकों सताता है।
हकिकत से होते ही रुबरू आंसूओं को बहा गया।
ज़िन्दगी की दौड़ में न जाने मैं कहां आ गया।
---दिलीप---