क्यों ज़रा सी बात पे लोग मिटा लेतें हैं खुदको।
यूं हर पल सबकी तमन्नाएं होती पूरी तो नहीं।
आंखों में सपने लेकर जीता तो है हर कोई।
पर हर सपने हकिकत बन जाएं ये ज़रूरी तो नहीं ......
---दिलीप---

किसी की किस्मत में हैं उजाले भरे दिन।
किसी की किस्मत में अंधरे भरी रात है।
किसी की हथेलियां हैं बरसों से खाली।
किसी के हाथों में अपनों का हाथ है।
कोई चाहकर भी नहीं मिल पाता अपनों से।
कोई हर रोज करता अपनों से मुलाकात है।
किसी को नहीं मिलती एक पल की भी खुशी।
किसी को मिलता हर पल हसी सौगात है।
कोई ये नहीं जानता कि ये रोना क्या है।
किसी के आंखों से होती अंसूओं की बरसात है।
क्यों किसी के हिस्से में है गम किसी के खुशी।
जबकी सुना है खुदा रहता सबके साथ है।
---दिलीप--
आंखों में उनकी सूरत दिल में उनका फसाना है।
ये मेरा नादान दिल बस उन्हीं का दिवाना है।
क्या हुआ जो अभी वो दूर रहा करती हैं मुझसे
एक दिन उन्हें वापस मेरे ही पास आना है।
हर पल इस दिल की बस यही है तमन्ना।
कभी न कभी उन्हें अपना बनाना है।
डर लगता है उन्हें कोई छीन न ले मुझसे
उनकी सूरत को अपनी आंखों में छुपाना है।
मेरे अपने कहते है ए नई नई दिल्लगी है।
क्या जाने वो की ए रोग बहुत पुराना है।
प्यार करने वालों को क्यों मिलती है मौत।
क्यों होता इतना बेदर्द ए जवाना है।
क्यों लोगों ने बनाई है अमीरी गरीबी की दिवार।
सब जानते है इक दिन सबका एक ही ठिकाना है
लोग कहते हैं मेरे चेहरे पर वो हसी न रही।
आज मुझे भी दिल खोलकर मुस्कुराना है।
खुदा तेरा उम्र भर एहसान रहेगा मुझपर।
तुने मुझे जो दिया इतना हसी नज़राना है।
--दिलीप--
कुछ रिश्तों को खोया कुछ रिश्तों को पा गया।
ज़िन्दगी की दौड़ में न जाने मैं कहां आ गया।
कभी-कभी इस चकाचौंध से सहम सा जाता हूं।
जब हज़ारों की भीड़ में खुद को तन्हा पाता हूं।
हमारे लिए तो वो बचपन का दिन ही प्यारा था।
टूटा- फूटा ही सही पर वो घर तो हमारा था।
जब देखता हूं मुड़कर आंखे भर जाती हैं।
घर के आंगन में बैठी मां नज़र आती है।
जी करता है मां कहकर गले से लिपट जाऊ।
बिना उनके दिल नहीं लगता है उनकों ये बताऊ।
आंखे खुलते मां का चेहरा धूंघला नज़र आता है।
फिर वहीं अकेले पन का डर मुझकों सताता है।
हकिकत से होते ही रुबरू आंसूओं को बहा गया।
ज़िन्दगी की दौड़ में न जाने मैं कहां आ गया।
---दिलीप---

हर रोज मिलते हैं हज़ार लोग मुझसे।
एक उन्हीं का चेहरा नज़र आता नहीं है।
जाने मैं खोया रहता हूं किसकी यादों में।
मेरा दिल ए खुद समझ पाता नहीं है।
सपनों में देखता हूं सारे ज़हान को मैं।
खुदा बस उन्हीं का ख़्वाब दिखाता नहीं है।
लोग कहते हैं दुनिया खुबसूरत है बहुत।
तो इन नज़रों को कोई और क्यों भाता नहीं है।
कितनी भी करलू मैं हसने की कोशिश।
फिर भी मेरा चेहरा मुस्कुराता नहीं है।
बिना उनके शायद जी न पाउंगा मैं।
ए बात कोई उनकों क्यों बताता नहीं है।
सुना है सच्चा प्यार हो तो रब भी झुकता है।
तो खुदा उनसे क्यों मुझे मिलाता नहीं है।
मैं जानता हूं ए ख़्वाहिस ए मेरी तम्मना है झूठी।
फिर ए दिल क्यों बिना उनके रह पाता नहीं है।
---दिलीप---
कभी-कभी इस दिल को किसी की जरुरत सी लगती है।
इन आंखों को हर इक शक्ल उन्हीं की सुरत सी लगती है।
जब कभी भी लेता हुं उनका नाम अपने नाम के साथ।
तो न जाने क्यों ये ज़िन्दगी और खुबशुरत सी लगती है.....
---दिलीप---